पुजाये

वास्तु शांति पूजा

वास्तु शांति का मुख्य उद्देश्य है एक स्थान को सकारात्मक ऊर्जा से भरना और उसमें शांति और समृद्धि को बनाए रखना। जातक का घर या कार्यस्थल दोनो का उसके निजी जीवन पर प्रभाव रहता है, यहा शांति और सकारात्मकता वहाँ रहने वालों को भी प्रभावित करती है, क्योंकि एक पॉजिटिव वातावरण में रहने से उनका मन और स्वस्थ दोनो खुशहाल रहते है। वास्तु शांति के रिटुअल्स और प्रयोग घर की ऊर्जा को संतुलित करते हैं और वहाँ की वातावरणिक स्थिति को सुधारते हैं। इससे लोगों की दिनचर्या पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।

कुंभ विवाह/अर्क विवाह :-

ज्योतिष शास्त्र में शास्त्रों आधार पर कुंभ विवाह/अर्क विवाह /और पीपल विवाह का वर्णन मिलता है जन्म पत्रिका में वैधव्य दोष होने पर, विवाह प्रतिबंधक दोष होने पर, सप्तम भाव का मालिक 6 ,8 ,12 भाव में होने पर, कुंडली में सप्तम भाव और सप्तमेश के पीड़ित होने पर, सप्तम भाव का मालिक नीचे नवमांश पर होने पर, 28 योग में से जो अशुभ योग है उसमें जन्म होने पर, सप्तम भाव में मंगल दोष या अंगारक दोष होने पर अर्क विवाह /पीपल विवाह /और कुंभ विवाह करवाया जाता है, यह ग्रहशांति कर्म विवाह आदि संस्कार शुभ नक्षत्र में तथा शिव जी के मंदिर में माता-पिता की उपस्थिति में किया जाता है !

कालसर्प दोष शांति

कालसर्प दोष शांति किसी भी जातक की जन्म पत्रिका (कुंडली) में राहु केतु को छोड़कर सभी ग्रह एक तरफ विराजमान (स्थापित) हो जाते हैं उसे जातक की जन्म पत्रिका में कालसर्प दोष उत्पन्न होता है, कालसर्प दोष 288 प्रकार के होते हैं मुख्य रूप में 12 प्रकार के कालसर्प होते हैं, अनंत नाम का कालसर्प, तक्षक कालसर्प, महापदम कालसर्प, पद्मनाभ नाम का कालसर्प, कुलिक नामक कालसर्प, इत्यादि 12 प्रकार के कालसर्प होते हैं जिनका निवारण हमारे द्वारा जातक की कुंडली को ध्यान में रख कर किया जाता है।

पितृ दोष शांति :-

पुत्रदोष पूजन एक परंपरागत धार्मिक अनुष्ठान है, जो कई धार्मिक संस्कृतियों और समाजों में प्रचलित है। इसमें पितृ पूजा, मन्त्रों का पाठ, हवन, और धार्मिक क्रियाओं का सम्पूर्ण कार्यक्रम होता है। यह धार्मिक अनुष्ठान विशेष रूप से पित्रो की शांती (पूर्वजों का आशीर्वाद पाने), सुख की प्राप्ति के लिए किया जाता है।, पितृ दोष जातक की कुंडली के अनुसार कुंडली का वरण कर देखा जाता है, कुंडली के अनुसार ही पितृ दोष का निवारण पूजन किया जाता है, पितृ दोष के कारण धन हानि, कार्य सफल न होना, घर में नकारात्मकता और कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने पड़ते हैं ।

मंगल दोष पूजा :-

मंगल दोष को लग्न दोष भी कहा जाता है मंगल दोष का मुख्य कारण शादी में रुकावट, कार्य संपूर्ण न होने देना, रिश्तो में दरार, पति-पत्नी में कलह की भावना और अंजान दुश्मनों का पैदा होना मंगल दोष के कारण माने जाते हैं, मंगल दोष का विचार अनेक प्रकार से किया जाता है लगन से मंगल, चंद्र से मंगल ,शुक्र से मंगल, और सप्तमेश से मंगल, मंगल ग्रह ज्योतिष शास्त्र में सेनापति के नाम से जाना जाता है यह अंगारे के समान लाल वर्ण का होता है मंगल दोष की शांति के लिए उज्जैन में मंगल का भात पूजन किया जाता है

उज्जैन में मंगल की पूजा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार मंगल को धरनी पुत्र कहा गया है और मंगल का जन्म स्थान उज्जैन में ही है इसलिए यहां पर मंगल का पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है तथा विवाह क्षेत्र में जो विलंब आ रहा है उसे समस्या का समाधान भी होता है।

अंगारक दोष :-

किसी भी जन्म पत्रिका में मंगल के साथ में राहु केतु का प्रभाव या राहु केतु की युति होने के कारण अंगारक दोष का निर्माण होता है यह दोष होने पर जीवन में मानसिक तनाव शारीरिक परेशानी चिड़चिड़ापन तथा अस्पताल में पैसा खर्च होता है तथा कानूनी कार्यवाही होने की संभावनाएं भी बनी रहती है। मंगल एक क्रूर ग्रह है उसके साथ में राहु केतु का प्रभाव होने के कारण मंगल के अंदर और उग्रता आ जाती है जो अपराधिक प्रवृत्ति का भी कारण है, अंगारक दोष की शांति के लिए शिप्रा नदी पर स्थित उज्जैन में श्री अंगार ईश्वर महादेव पर भात पूजन और संपूर्ण ग्रह शांति विधान किया जाता है, जिससे अंगारक दोष होने पर अंगारक दोष की शांति होती है और सुबह फल की प्राप्ति होती है